"संस्कृतं जीवस्य मूलं अस्ति। या भाषा न केवल वाणी का माध्यम है, अपितु चिंतन की शुद्धि, आचरण की पवित्रता और आत्मा की अभिव्यक्ति है। संस्कृत वह ज्योति है, जो मानव के अंतःकरण को आलोकित करती है।"
संस्कृत भाषा कोई मात्र पुरातन ग्रंथों की भाषा नहीं, अपितु यह जीवन के हर पहलू को दिशा देने वाली दिव्य वाणी है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने इसी भाषा में वेद, उपनिषद्, शास्त्र, काव्य, दर्शन एवं आयुर्वेद जैसे अमूल्य ज्ञान को सुरक्षित किया। यह भाषा संयम सिखाती है, शांति सिखाती है, और मनुष्य को मनुष्यता की ओर ले जाती है।
संस्कृत पाठशाला की स्थापना का उद्देश्य केवल भाषा सिखाना नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से जुड़ने का माध्यम देना है। मेरी शुभकामनाएँ हैं कि पाठशाला आने वाली पीढ़ियों को संस्कृत के माध्यम से अपने सांस्कृतिक गौरव से जोड़ती रहे।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें – "संस्कृतं शरणं गच्छामि। संस्कृतं जीवनं मम।"